सनातन धर्म :-
सनातन धर्म के सिद्धान्त के कुछ मुख्य बिन्दु :-
सनातन धर्म :
सनातन धर्म में प्राकृतिक शक्तियों की ही पूजा की जाती थी और कर्मकांडों की प्रमुखता नहीं थी। मूर्ति पूजन नहीं होता था और ना ही मंत्रोचार किया जाता था। कर्मकांडों जैसे पूजा-पाठ, व्रत,यज्ञ आदि सनातन धर्म में नहीं होते थे। सनातन धर्म को वास्तव में ऋग्वैदिक सनातन धर्म भी कहा जाता है। सनातनी मुख्य रूप से केवल ब्रह्माण्ड को धारण करने वाले एकमात्र परमपिता परमेश्वर के पूजक थे। सनातनी केवल ईश्वर को ही मानते थे। सनातन धर्म का एक मात्र मन्त्र गायत्री मंत्र हैं गायात्री महामंत्र का गायात्री छ्न्द-विश्वामित्र ऋषी और सविता देवता हैं जो सविता (सूर्य देव) को समर्पित है। सविता बोल-चाल की भाषा में सूर्य कौ कहते हैं। सावित्री में जो शक्ति हैं, वह सविता हैं। यों सविता, परब्रह्म परमात्मा को भी कहते हैं। सविता परमात्मा का तेजपुंज ब्रह्म हैं, जिसके प्रभाव और प्रकाश से यह सारा द़ृश्य जगत सक्रिय हैं। उस सविता की समग्र क्षमता एवम् स्थिति की प्राण प्रक्रिया को सावित्री माना गया हैं। शरीर और प्राण में जो संबंध है, वही सविता और सावित्री में है । प्राणी के अस्तित्व को प्रकाश एवं अनुभव में लाने के लिए शरीर चाहिए और शरीर सजीव बना रहे, उसके लिए उसमें प्राण की स्थिति आवश्यक है। एक के बिना दूसरे की गति नहीं, स्थिति नहीं, उपयोगिता नहीं, शोभा नहीं । इसी प्रकार सविता और सावित्री एक दूसरे के लिए जुड़े हुए हैं।
सुर्य मंत्र :-
ॐ सुर्याय नम:
सुर्य गायात्री मंत्र :-
तत् सवितुर वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि, धियो योनः प्रचोदयात् !
तत्=सर्वव्यापी, परम, निराकार, सवितुर= सुर्य, वरेण्यं=तेजस्विता, भर्गो=वैभव, देवस्य=दिव्य, धीमहि=समर्पन करना, धियो=आशिर्वाद मांगना, योनः=विषिष्ट इक्छा, प्रचोदयात्=अनुग्रिहीत या धन्य
गायात्री मंत्र हैं :-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
ऋग्वैदिक सनातन काल में सनातन धर्म के अलावा और कोई अन्य मुख्य सम्प्रदाय(वर्णाश्रम) नही था जैसे: वैष्णव, शैव, शाक्त इत्यादि।
बाद मे वैदिक धर्म का आगमन हुआ और वैष्णव (जो विष्णु को परमेश्वर मानते हैं), शैव (जो शिव को परमेश्वर मानते हैं), शाक्त (जो देवी को परमशक्ति मानते हैं) पंथ का आगमन हुआ। जैसे जैसे समय बितता गया और कई अन्य पंथों का उद्भव हुआ जैसे जैन, बोद्ध, सिक्ख इत्यादी। मानव का आत्मा ही ब्रह्म हैं और जब मानव ब्रह्म को अपने मन से जानने की कोशिश करता है, तब ब्रह्म भगवान हो जाता हैं। प्रणव ॐ (ओम्) ब्रह्मवाक्य है, जिसे सभी हिन्दू परम पवित्र शब्द मानते हैं। हिन्दू यह मानते हैं कि ओम् की ध्वनि पूरे ब्रह्माण्ड में गूंज रही है। ध्यान में गहरे उतरने पर यह सुनाई देता है। प्रणव ॐ (ओम्) ब्रह्मवाक्य के उच्चारण से आत्म ब्रह्म अपने भुतकाल और सृष्टि से जुड़े विषय की जानकारी देता हैं। ब्रह्म हिन्दू धर्मग्रन्थ उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म ही परम तत्त्व है (इसे त्रिमूर्ति के देवता ब्रह्मा से भ्रमित न करें)। वो ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है। वो विश्व का आधार है।
सनातन धर्म का सबसे बड़ा पर्व छठ पर्व हैं।

0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें