महर्षि मनु  और उनका युग यात्रा - धर्मसंस्थापनार्थाय :- 




सतयुग :- महर्षि मनु का जन्म सतयुग मे हुआ था। महर्षि मनु ब्रह्मा ( सुर्यदेव ) के पुत्र थे। मनु सूर्यवंशी योगीपुरुष थे। जैसे त्रेतायुग मे जन्मे श्रि राम को विष्ण के एक अवतारी पुरुष माना गया और मर्यादा पुरूषोतम कहा गया, वैसे ही सतयुग में मनु को योगेश्वर तथा महर्षि कहा जता था। जब त्रेतायुग में राम अयोध्या के राजा थे तो इसका मतलब ये हुआ कि राम से हजारो साल पहले से ही गृह एवं समाजिक व्यवस्था और संरचना का विकास हो चुकी थी। इसिलिये हम कह सकते हैं कि महर्षि मनु क सामाजिक व्यवस्था के उतरकाल में अवतार हुआ और वो गृह, सामाज, धर्म, वीधि और न्याय के प्रणेता एवं व्यवस्थापक और साथ ही सनातन धर्म के जनक बने।

त्रेतायुग :- महर्षि मनु का जन्म त्रेतायुग में मर्यादा पुरूषोतम श्रि राम के समय मे चैत्र पू्र्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र में जंगल की गुफा में हुआ था। त्रेतायुग में अद्वितीय शक्तियां और ताकत, अत्यंत बलिष्ठ, कंधे पर जनेऊ, अंहकार शून्यता और काफी विनम्र पुरुष थे। वे सुर्यवंशी राजा के कुल मे जन्म लिये थे। वे सदाचारि, ब्रह्मचारी, आत्मसंयमी, व्याकरणविद्, एक विद्वान योगी पुरुष थे।    

द्वापरयुग :- महर्षि मनु का जन्म द्वापरयुग में योगेश्वर श्रि कृष्णा के समय में उत्तर फाल्गुन नक्षत्र में जंगलों में जन्म हुआ था।  द्वापरयुग में सबसे अच्छे धनुर्धर, गांडीवधारी , ताकतवर और बुद्धिमान, पराक्रमी, प्रभावशाली व्यक्तित्व, शिघ्रकारिता, स्फूर्तिवान, विशादहीनता  और धर्यवान  पुरुष थे। वे चंद्रवंशी राजा के कुल में जन्म लिये थे।

कलयुग :-महर्षि मनु का जन्म कल्युग के अंत में उस समय होगा जब सनातन, वैदिक और हिंदू तीनों पतन के अंतिम कागार पर आ जायेंगे और बांकी पंथ भी किसी ना किसी करण से या तो हाँस होने लगेंगे या खंडित होकर टूट जाएँगे तब अद्वितीय शक्ति, धर्यवान, विद्वान योगी पुरुष के रुप में अपने जोड़ी के साथ जन्म लेंगें।

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